Surah Ale Imran in Hindi | सूरह-3 आले-इमरान हिंदी में रुकूअ 11-20

Surah Ale Imran in Hindi: – जैसा कि आप सभी ने सूरह इमरान के रुकूअ 1-10 तक को हमारी पिछली पोस्ट में पढ़ ही लिया होगा। अगर नहीं पढ़ा है तो आप नीचे दिए लिंक से पढ़ सकते हैं।

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यहाँ से पढ़ें: – सूरह इमरान रुकूअ 1-10 तक

इस पोस्ट में हमने Surah Ale Imran के रुकूअ 11-20 तक को हिंदी में तर्जुमा के साथ मौजूद कराया है।

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Surah Al Imran In Hindi | सूरह इमरान हिंदी में

सूरह इमरान रुकूअ 11-20 तक


रुकूअ- 11

या अय्युहल्लज़ी-न आमनुत्तकुल्ला ह हक्-क तुक़ातिही व ला तमूतुन्-न इल्ला व अन्तुम् मुस्लिमून (102)
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो, जैसा कि उसका डर रखने का हक़ है। और तुम्हारी मृत्यु बस इस दशा में आए कि तुम मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो।

वअ्तसिमू बि-हब्लिल्लाहि जमीअंव ‘ व ला तफर्रकू वज्कुरू निअ्-मतल्लाहि अलैकुम् इज् कुन्तुम् अअ्दा-अन् फ़-अल्ल-फ़ बै-न कुलूबिकुम् फ़-अस्बह़्तुम् बिनिअ्मतिही इख्वानन् व कुन्तुम् अला शफ़ा हुफ्रतिम् मिनन्नारि फ़-अन्क-जकुम् मिन्हा , कज़ालि-क युबय्यिनुल्लाहु लकुम् आयातिही लअ़ल्लकुम् तह्तदून (103)
और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और विभेद में न पड़ो। और अल्लाह की उस कृपा को याद करो जो तुमपर हुई। जब तुम आपस में एक-दूसरे के शत्रु थे तो उसने तुम्हारे दिलों को परस्पर जोड़ दिया और तुम उसकी कृपा से भाई-भाई बन गए। तुम आग के एक गड्ढे के किनारे खड़े थे, तो अल्लाह ने उससे तुम्हें बचा लिया। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम मार्ग पा लो।

वल्तकुम् मिन्कुम् उम्मतुंय्यद्अू-न इलल्खैरि व यअ्मुरू-न बिल्मअ्रूफ़ि व यन्हौ-न अनिल्मुन्करि , व उलाइ-क हुमुल मुफ्लिहून (104)
और तुम्हें एक ऐसे समुदाय का रूप धारण कर लेना चाहिए जो नेकी की ओर बुलाए और भलाई का आदेश दे और बुराई से रोके। यही सफलता प्राप्त करनेवाले लोग हैं।

व ला तकूनू कल्लज़ी-न तफर्रकू वख़्त-लफू मिम्-बअ्दि मा जा अहुमुल-बय्यिनातु व उलाइ-क लहुम-अज़ाबुन अज़ीम (105)
तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जो विभेद में पड़ गए, और इसके पश्चात कि उनके पास खुली निशानियाँ आ चुकी थीं, वे विभेद में पड़ गए। ये वही लोग हैं, जिनके लिए बड़ी (घोर) यातना है। (यह यातना उस दिन होगी)

यौ-म तब्यज्जु वुजूहुंव-व तस्वद्दु वुजूहुन् फ़-अम्मल्लज़ीनस्-वद्दत वुजूहुहुम् , अ-कफर्तुम् बअ्- द ईमानिकुम् फ़जूकुल-अज़ा-ब बिमा कुन्तुम् तक्फुरून (106)
जिस दिन कितने ही चेहरे उज्ज्वल होंगे और कितने ही चेहरे काले पड़ जाएँगे, तो जिनके चेहरे काले पड़ गए होंगे (वे सदा यातना में ग्रस्त रहेंगे। खुली निशानियाँ आने के बाद जिन्होंने विभेद किया) उनसे कहा जाएगा, “क्या तुमने ईमान के पश्चात इनकार की नीति अपनाई? तो लो अब उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो, यातना का मज़ा चखो।”

व अम्मल्लज़ीनब्-यज्जत् वुजूहहुम् फ़-फ़ी रह्मतिल्लाहि , हुम् फ़ीहा ख़ालिदून (107)
रहे वे लोग जिनके चेहरे उज्ज्वल होंगे, वे अल्लाह की दयालुता की छाया में होंगे। वे उसी में सदैव रहेंगे।

तिल-क आयातुल्लाहि नत्लूहा अलै-क बिल्हक्कि , व मल्लाहु युरीदु जुल्मल लिल्आलमीन (108)
ये अल्लाह की आयतें हैं, जिन्हें हम हक़ के साथ तुम्हें सुना रहे हैं। अल्लाह संसारवालों पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं करना चाहता।

व लिल्लाहि मा फिस्समावाति व मा फ़िल्अर्जि , व इलल्लाहि तुरजअु़ल उमूर (109)*
आकाशों और धरती में जो कुछ है अल्लाह ही का है, और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाते हैं।


रुकूअ- 12

कुन्तुम् खै-र उम्मतिन्-उख़्रिजत् लिन्नासि तअमुरू-न बिल्मअ्रूफ़ि व तन्हौ-न अनिल्मुन्करि व तुअमिनू-न बिल्लाहि , व लौ आम-न अह्लुल-किताबि लका-न खैरल्लहुम , मिन्हुमुल मुअमिनू-न व अक्सरूहुमुल फ़ासिकून (110)
तुम एक उत्तम समुदाय हो, जो लोगों के समक्ष लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो। और यदि किताबवाले भी ईमान लाते तो उनके लिए यह अच्छा होता। उनमें ईमानवाले भी हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग अवज्ञाकारी ही हैं।

लंय् यज़ुर्रूकुम् इल्ला अज़न् , व इंय्युक़ातिलूकुम् युवल्लूकुमुल अद-ब-र , सुम्-म ला युन्सरून (111)
थोड़ा दुख पहुँचाने के अतिरिक्त वे तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। और यदि वे तुमसे लड़ेंगे, तो तुम्हें पीठ दिखा जाएँगे, फिर उन्हें कोई सहायता भी न मिलेगी।

जुरिबत् अलैहिमुज्ज़िल्लतु ऐनमा सुकिफू इल्ला बि-हब्लिम् मिनल्लाहि व हब्लिम्-मिनन्नासि व बाऊ बि-ग-ज़बिम् मिनल्लाहि व जुरिबत् अलैहिमुल्-मस्क-नतु , ज़ालि-क बि-अन्नहुम् कानू यक्फुरू-न बिआयातिल्लाहि व यक़्तुलूनल् अम्बिया-अ बिगैरि हक्किन् , ज़ालि-क बिमा अ-सव्-व कानू यअ्तदून (112)
वे जहाँ कहीं भी पाए गए उनपर ज़िल्लत (अपमान) थोप दी गई। किन्तु अल्लाह की रस्सी थामें या लोगों की रस्सी, तो और बात है। वे अल्लाह के प्रकोप के पात्र हुए और उनपर दशाहीनता थोप दी गई। यह इसलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार और नबियों को नाहक़ क़त्ल करते रहे हैं। और यह इसलिए कि उन्होंने अवज्ञा की और सीमोल्लंघन करते रहे।

लैसू सवाअन् , मिन् अहिलल्-किताबि उम्मतुन् काइ-मतुंय्यत् लू-न आयातिल्लाहि आनाअल्लैलि व हुम् यस्जुदून (113)
ये सब एक जैसे नहीं हैं। किताबवालों में से कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सीधे मार्ग पर हैं और रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और वे सजदा करते रहनेवाले हैं।

युअ्मिनू-न बिल्लाहिवल्यौ मिल-आखिरि व यअ्मु रू-न बिल-मअ्रूफि व यन्हौ-न अनिल्मुन्करि व युसारिअू-न फिल्खै राति , व उलाइ-क मिनस्सालिहीन (114)
वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं और नेकी का हुक्म देते और बुराई से रोकते हैं और नेक कामों में अग्रसर रहते हैं, और वे अच्छे लोगों में से हैं।

व मा यफ्अलू मिन् खैरिन् फ़-लंय्युक्फरूहु , वल्लाहु अलीमुम् बिल-मुत्तकीन (115)
जो नेकी भी वे करेंगे, उसकी अवमानना न होगी। अल्लाह डर रखनेवालों से भली-भाँति परिचित है।

इन्नल्लज़ी-न क-फरू लन् तुग्नि-य अन्हुम् अम्वालुहुम् वला औलादुहुम् मिनल्लाहि शैअन् , व उलाइ-क अस्हाबुन्नारि हुम् फ़ीहा ख़ालिदून (116)
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, तो अल्लाह के मुक़ाबले में न उनके माल कुछ काम आ सकेंगे और न उनकी सन्तान ही। वे तो आग में जानेवाले लोग हैं, उसी में वे सदैव रहेंगे।

म-सलु मा युन्फिकू-न फ़ी हाज़िहिल हयातिदुन्या क-म-सलि रीहिन फ़ीहा सिर्रून् असाबत हर्-स कौमिन् ज़-लमू अन्फु-सहुम् फ़-अह़्-ल-कत्हु , व मा ज़-ल-महुमुल्लाहु व लाकिन् अन्फु-सहुम् यज्लिमून (117)
इस सांसारिक जीवन के लिए जो कुछ भी वे ख़र्च करते हैं, उसकी मिसाल उस वायु जैसी है जिसमें पाला हो और वह उन लोगों की खेती पर चल जाए, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया है और उसे विनष्ट करके रख दे। अल्लाह ने उन पर कोई अत्याचार नहीं किया, अपितु वे तो स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे हैं।

या अय्युहल्लज़ी-न आमनू ला तत्तखिजू बितान-तम् मिन् दूनिकुम् ला यअ्लूनकुम् ख़बालन् , वद्दू मा अनित्तुम् कद् ब-दतिल-बग्जा-उ मिन् अफ्वाहिहिम् व मा तुख़फ़ी सुदूरूहुम् अक्बरू , क़द् बय्यन्ना लकुमुल-आयाति इन् कुन्तुम् तअ़किलून (118)
ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए हैं, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।

हा-अन्तुम् उला-इ तुहिब्बूनहुम् व ला युहिब्बूनकुम् व तुअमिनू-न बिल्किताबि कुल्लिही व इज़ा लकूकुम् कालू आमन्ना व इज़ा ख़लौ अज्जू अलैकुमूल-अनामि-ल मिनल-गैज़ि , कुल मूतू बिगैजिकुम् , इन्नल्ला-ह अलीमुम् बिज़ातिस्सुदूर (119)
ये तो तुम हो जो उनसे प्रेम करते हो और वे तुमसे प्रेम नहीं करते, जबकि तुम समस्त किताबों पर ईमान रखते हो। और वे जब तुमसे मिलते हैं तो कहने को तो कहते हैं कि “हम ईमान लाए हैं।” किन्तु जब वे अलग होते हैं तो तुमपर क्रोध के मारे दाँतों से उँगलियाँ काटने लगते हैं। कह दो, “तुम अपने क्रोध में आप मरो। निस्संदेह अल्लाह दिलों के भेद को जानता है।”

इन् तम्सस्कुम् ह-स-नतुन् तसुअ्हुम् व इन् तुसिब्कुम् सय्यि-अतुय्यफ़्रहू बिहा , व इन् तस्बिरू व तत्तकू ला यजुर्रूकुम कैदुहुम् शैअन् , इन्नल्ला-ह बिमा यअ्मलू-न मुहीत (120)*
यदि तुम्हारा कोई भला होता है तो उन्हें बुरा लगता है। परन्तु यदि तुम्हें कोई अप्रिय बात पेश आती है तो उससे वे प्रसन्न हो जाते हैं। यदि तुमने धैर्य से काम लिया और (अल्लाह का) डर रखा, तो उनकी कोई चाल तुम्हें कुछ भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। जो कुछ वे कर रहे हैं, अल्लाह ने उसे अपने घेरे में ले रखा है।

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Surah Ale Imran रुकूअ- 13

व इज् ग़दौ-त मिन् अह़्लि-क तुबविउल-मुअ्मिनी-न मकाअि-द लिल्क़ितालि , वल्लाहु समीअुन् अलीम (121)
याद करो जब तुम सवेरे अपने घर से निकलकर ईमानवालों को युद्ध के मोर्चों पर लगा रहे थे।-अल्लाह तो सब कुछ सुनता, जानता है।

इज् हम्मत्ता-इ-फ़तानि मिन्कुम् अन् तफ़्शला वल्लाहु वलिय्युहुमा , व अलल्लाहि फल्य-तवक्कलिल् मुअ्मिनून (122)
जब तुम्हारे दो गरोहों ने साहस छोड़ देना चाहा, जबकि अल्लाह उनका संरक्षक मौजूद था-और ईमानवालों को तो अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।

व लकद् न-स-रकुमुल्लाह बि-बद्रिंव-व अन्तुम् अज़िल्लतुन् फत्तकुल्ला-ह लअ़ल्लकुम् तश्कुरून (123)
और बद्र में अल्लाह तुम्हारी सहायता कर भी चुका था, जबकि तुम बहुत कमज़ोर हालत में थे। अतः अल्लाह ही का डर रखो, ताकि तुम कृतज्ञ बनो।

इज् तकूलु लिल्-मुअ्मिनी-न अलंय्यक्फ़ि-यकुम् अंय्युमिद्दकुम् रब्बुकुम् बि-सलासति आलाफिम् मिनल-मलाइ-कति मुन्ज़लीन (124)
जब तुम ईमानवालों से कह रहे थे, “क्या यह तुम्हारे लिए काफ़ी नही है कि तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतारकर तुम्हारी सहायता करे?”

बला इन् तस्बिरू व तत्तकू व यअ्तूकुम् मिन् फ़ौरिहिम् हाज़ा युमदिद्कुम् रब्बुकुम् बि-ख़म्सति आलाफ़िम् मिनल् मलाइ-कति मुसव्विमीन • (125)
हाँ, क्यों नहीं। यदि तुम धैर्य से काम लो और डर रखो, फिर शत्रु सहसा तुमपर चढ़ आएँ, उसी क्षण तुम्हारा रब पाँच हज़ार विध्वंसकारी फ़रिश्तों से तुम्हारी सहायता करेगा।

व मा ज-अ-लहुल्लाहु इल्ला बुश्रा लकुम् व लि-तत्मइन्-न कुलूबुकुम् बिही , व मन्नसरू इल्ला मिन् अिन्दिल्लाहिल अज़ीज़िल हकीम (126)
अल्लाह ने तो इसे तुम्हारे लिए बस एक शुभ-सूचना बनाया और इसलिए कि तुम्हारे दिल सन्तुष्ट हो जाएँ-सहायता तो बस अल्लाह ही के यहाँ से आती है जो अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।

लि-यक़्त-अ त-रफ़म् मिनल्लज़ी-न क-फरू औ यक्बि-तहुम् फ़-यन्कलिबू ख़ा-इबीन (127)
ताकि इनकार करनेवालों के एक हिस्से को काट डाले या उन्हें बुरी तरह पराजित और अपमानित कर दे कि वे असफल होकर लौटें।

लै-स ल-क मिनल अम्रि शैउन् औ यतू-ब अलैहिम् औ युअ़ज्जि-बहुम् फ़-इन्नहुम् ज़ालिमून (128)
तुम्हें इस मामले में कोई अधिकार नहीं-चाहे वह उनकी तौबा क़बूल करे या उन्हें यातना दे, क्योंकि वे अत्याचारी हैं।

व लिल्लाहि मा फिस्समावाति व मा फ़िलअर्जि , यगफिरू लिमंय्यशा-उ व युअज्जिबु मंय्यशा-उ , वल्लाहु गफूरूर्रहीम (129)*
आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, अल्लाह ही का है। वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।


Surah Ale Imran रुकूअ- 14

या अय्युहल्लज़ी-न आमनू ला तअ्कुलुर्रीबा अज्आफम् मुज़ा-अ-फ़तन् वत्तकुल्ला-ह लअल्लकुम् तुफिलहून (130)
ऐ ईमान लानेवालो! बढ़ोत्तरी के ध्येय से ब्याज न खाओ, जो कई गुना अधिक हो सकता है। और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो।

वत्तकुन्-नारल्लती उअि़द्दत् लिल-काफ़िरीन (131)
और उस आग से बचो जो इनकार करनेवालों के लिए तैयार है।

व अतीअुल्ला-ह वर्रसू-ल लअल्लकुम् तुर्हमून (132)
और अल्लाह और रसूल के आज्ञाकारी बनो, ताकि तुमपर दया की जाए।

व सारिअू इला मगफ़ि-रतिम् मिर्रब्बिकुम् व जन्नतिन् अर्जुहस्-समावातु वल्-अर्जु उअिद्दत लिल्मुत्तक़ीन (133)
और अपने रब की क्षमा और उस जन्नत की ओर बढ़ो, जिसका विस्तार आकाशों और धरती जैसा है। वह उन लोगों के लिए तैयार है जो डर रखते हैं।

अल्लज़ी-न युन्फिकू-न फ़िस्सर्रा-इ वज़्ज़र्रा-इ वल्काज़िमीनल-गै-ज़ वल्आफ़ी-न अनिन्नासि , वल्लाहु युहिब्बुल मुहिसनीन (134)
वे लोग जो ख़ुशहाली और तंगी की प्रत्येक अवस्था में ख़र्च करते रहते हैं और क्रोध को रोकते हैं और लोगों को क्षमा करते हैं-और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय हैं, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते हैं।

वल्लज़ी-न इज़ा फ़-अलू फ़ाहि-शतन् औ ज़-लमू अन्फु-सहुम् ज़-करूल्ला-ह फस्तग्फरू लिजुनूबिहिम् , व मंय्यग्फिरूज्जुनू-ब इल्लल्लाहु व लम् युसिर्रू अला मा फ़-अलू व हुम् यअ्लमून (135)
और जिनका हाल यह है कि जब वे कोई खुला गुनाह कर बैठते हैं या अपने आप पर ज़ुल्म करते हैं तो तत्काल अल्लाह उन्हें याद आ जाता है और वे अपने गुनाहों की क्षमा चाहने लगते हैं-और अल्लाह के अतिरिक्त कौन है, जो गुनाहों को क्षमा कर सके? और जानते-बूझते वे अपने किए पर अड़े नहीं रहते।

उलाइ-क जज़ाउहुम् मगफ़ि-रतुम् मिर्रब्बिहिम् व जन्नातुन् तज्री मिन् तह़्तिहल अन्हारू ख़ालिदी-न फीहा , व निअ्-म अज्रूल आमिलीन (136)
उनका बदला उनके रब की ओर से क्षमादान है और ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। और क्या ही अच्छा बदला है अच्छे कर्म करनेवालों का।

कद् ख़लत् मिन् कब्लिकुम् सु-ननुन् फ़सीरू फिलअर्जि फन्जुरू कै-फ़ का-न आकि बतुल मुकज्जिबीन (137)
तुमसे पहले (धर्मविरोधियों के साथ अल्लाह की) रीति के कितने ही नमूने गुज़र चुके हैं, तो तुम धरती में चल-फिरकर देखो कि झुठलानेवालों का क्या परिणाम हुआ है।

हाज़ा बयानुल्-लिन्नासि व हुदंव-व मौअि़-ज़तुल् लिल्मुत्तक़ीन (138)
यह लोगों के लिए स्पष्ट बयान और डर रखनेवालों के लिए मार्गदर्शन और उपदेश है।

व ला तहिनू व ला तहज़नू व अन्तुमुल अअ्लौ-न इन् कुन्तुम् मुअ्मिनीन (139)
हताश न हो और दुखी न हो, यदि तुम ईमानवाले हो, तो तुम्हीं प्रभावी रहोगे।

इंय्यम्सस्कुम् करहुन् फ़-कद् मस्सल्क़ौ-म करहुम् मिस्लहू , व तिल्कल-अय्यामु नुदाविलुहा बैनन्नासि व लि-यअ्- लमल्लाहुल्लज़ी-न आमनू व यत्तखि-ज़ मिन्कुम् शु-हदा-अ , वल्लाहु ला युहिब्बुज्जालिमीन (140)
यदि तुम्हें आघात पहुँचे तो उन लोगों को भी ऐसा ही आघात पहुँच चुका है। ये युद्ध के दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच डालते ही रहते हैं और ऐसा इसलिए हुआ कि अल्लाह ईमानवालों को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए-और अत्याचारी अल्लाह को प्रिय नहीं हैं।

व लियुमह़्हिसल्लाहुल्लज़ी-न आमनू व यम्-हकल काफ़िरीन (141)
और ताकि अल्लाह ईमानवालों को निखार दे और इनकार करनेवालों को मिटा दे।

अम् हसिब्तुम् अन् तद्गुलुल-जन्न-त व लम्मा यअ्-लमिल्लाहुल्लज़ी-न जाहदू मिन्कुम् व यअ्-लमस्साबिरीन (142)
क्या तुमने यह समझ रखा है कि जन्नत में यूँ ही प्रवेश करोगे, जबकि अल्लाह ने अभी उन्हें परखा ही नहीं जो तुममें जिहाद (सत्य-मार्ग में जानतोड़ कोशिश) करनेवाले हैं।-और दृढ़तापूर्वक जमे रहनेवाले हैं।(

व ल-क़द् कुन्तुम् तमन्नौनल्मौ-त मिन् कब्लि अन् तल्कोहु फ़-कद् रऐतुमूहू व अन्तुम् तन्जुरून (143)*
और तुम तो मृत्यु की कामनाएँ कर रहे थे, जब तक कि वह तुम्हारे सामने नहीं आई थी। लो, अब तो वह तुम्हारे सामने आ गई और तुमने उसे अपनी आँखों से देख लिया।


रुकूअ- 15

व मा मुहम्मदुन् इल्ला रसूलुन् कद् खलत् मिन् कब्लिहिर्रूसुलु , अ-फ-इम्मा-त औ कुतिलन्-कलब्तुम् अला अअ्क़ाबिकुम् , व मंय्यन्कलिब् अला अकिबैहि फ़-लंय्यजुर्रल्ला-ह शैअन् , व स-यजज़िल्लाहुश्शाकिरीन (144)
मुहम्मद तो बस एक रसूल हैं। उनसे पहले भी रसूल गुज़र चुके हैं। तो क्या यदि उनकी मृत्यु हो जाए या उनकी हत्या कर दी जाए तो तुम उल्टे पाँव फिर जाओगे? जो कोई उल्टे पाँव फिरेगा, वह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ेगा। और कृतज्ञ लोगों को अल्लाह बदला देगा।

व मा का-न लि-नफ्सिन् अन् तमू त इल्ला बि-इज्निल्लाहि किताबम् मुअज्जलन् , व मंय्युरिद् सवाबद्दुन्या नुअ्तिही मिन्हा व मंय्युरिद् सवाबल-आखि्-रति नुअ्तिही मिन्हा , व स-नजज़िश्शाकिरीन (145)
और अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई व्यक्ति मर नहीं सकता। हर व्यक्ति एक लिखित निश्चित समय का अनुपालन कर रहा है। और जो कोई दुनिया का बदला चाहेगा, उसे हम इस दुनिया में से देंगे, जो आख़िरत का बदला चाहेगा, उसे हम उसमें से देंगे और जो कृतज्ञता दिखलाएँगे, उन्हें तो हम बदला देंगे ही।

व क-अय्यिम् मिन् नबिय्यिन् का-त-ल म-अहू रिब्बिय्यू-न कसीरून फ़मा व हनू लिमा असाबहुम् फ़ी सबीलिल्लाहि व मा ज़अुफू व मस्तकानू , वल्लाहु युहिब्बुस्साबिरीन (146)
कितने ही नबी ऐसे गुज़रे हैं जिनके साथ होकर बहुत-से ईशभक्तों ने युद्ध किया, तो अल्लाह के मार्ग में जो मुसीबत उन्हें पहुँची उससे वे न तो हताश हुए और न उन्होंने कोई कमज़ोरी दिखाई और न ऐसा हुआ कि वे दबे हों। और अल्लाह दृढ़तापूर्वक जमे रहनेवालों से प्रेम करता है।

व मा का-न कौलहुम् इल्ला अन् कालू रब्बनग्फ़िर लना जुनूबना व इस्राफ़ना फी अम्रिना व सब्बित अक्दामना वन्सुरूना अलल् कौमिल काफ़िरीन (147)
उन्होंने कुछ नहीं कहा सिवाय इसके कि “ऐ हमारे रब! तू हमारे गुनाहों को और हमारे अपने मामले में जो ज़्यादती हमसे हो गई हो, उसे क्षमा कर दे और हमारे क़दम जमाए रख, और इनकार करनेवाले लोगों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर।”

फ़-आताहुमुल्लाहु सवाबद्दुन्या व हुस्-न सवाबिल-आख़ि-रति , वल्लाहु युहिब्बुल-मुह़्सिनीन (148)*
अतः अल्लाह ने उन्हें दुनिया का भी बदला दिया और आख़िरत का अच्छा बदला भी। और सत्कर्मी लोगों से अल्लाह प्रेम करता है।


Surah Ale Imran रुकूअ- 16

या अय्युहल्लज़ी-न आमनू इन् तुतीअुल्लज़ी-न क-फरू यरूद्दूकुम् अला अअ्क़ाबिकुम् फ़-तन्कलिबू ख़ासिरीन (149)
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम उन लोगों के कहने पर चलोगे जिन्होंने इनकार का मार्ग अपनाया है, तो वे तुम्हें उल्टे पाँव फेर ले जाएँगे। फिर तुम घाटे में पड़ जाओगे।

बलिल्लाहु मौलाकुम् व हु-व खैरून्-नासिरीन (150)
बल्कि अल्लाह ही तुम्हारा संरक्षक है; और वह सबसे अच्छा सहायक है।

सनुल्की फी कुलू बिल्लज़ी-न क-फरूर्रूअ्-ब बिमा अश्रकू बिल्लाहि मा लम् युनज्जिल बिही सुल्तानन् व मअ्वाहुमुन्नारू , व बिअ्-स मस्वज़्जा़लिमीन (151)
हम शीघ्र ही इनकार करनेवालों के दिलों में धाक बिठा देंगे, इसलिए कि उन्होंने ऐसी चीज़ों को अल्लाह का साक्षी ठहराया है जिनके साथ उसने कोई सनद नहीं उतारी, और उनका ठिकाना आग (जहन्नम) है। और अत्याचारियों का क्या ही बुरा ठिकाना है।

व ल-कद् स-द-ककुमुल्लाहु वअ्दहू इज् तहुस्सूनहुम् बि-इज्निही हत्ता इज़ा फ़शिल्तुम् व तनाज़अ्तुम् फ़िल्अम्रि व असैतुम् मिम्-बअ्दि मा अराकुम् मा तुहिब्बू-न , मिन्कुम् मय्युरीदुद्दुन्या व मिन्कुम् मंय्युरीदुल-आखि-र-त सुम्-म स-र-फ़ कुम् अन्हुम् लि-यब्तलि-यकुम् व ल-कद् अफ़ा अन्कुम् , वल्लाहु जू फ़ज्लिन् अलल मुअ्मिनीन (152)
और अल्लाह ने तो तुम्हें अपना वादा सच्चा कर दिखाया, जबकि तुम उसकी अनुज्ञा से उन्हें क़त्ल कर रहे थे। यहाँ तक कि जब तुम स्वयं ढीले पड़ गए और काम में झगड़ा डाल दिया और अवज्ञा की, जबकि अल्लाह ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी थी जिसकी तुम्हें चाह थी। तुममें कुछ लोग दुनिया चाहते थे और कुछ आख़िरत के इच्छुक थे। फिर अल्लाह ने तुम्हें उनके मुक़ाबले से हटा दिया, ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले। फिर भी उसने तुम्हें क्षमा कर दिया, क्योंकि अल्लाह ईमानवालों के लिए बड़ा अनुग्राही है।

इज् तुस्अिदू-न व ला तल्वू-न अला अ-हदिंव-वर्रसूलु यद्अूकुम् फ़ी उख्राकुम् फ-असाबकुम् ग़म्मम्-बिगम्मिल लिकैला तह्ज़नू अला मा फ़ातकुम् व ला मा असाबकुम् , वल्लाहु ख़बीरूम् बिमा तअमलून (153)
जब तुम लोग दूर भागे चले जा रहे थे और किसी को मुड़कर देखते तक न थे और रसूल तुम्हें पुकार रहा था, जबकि वह तुम्हारी दूसरी टुकड़ी के साथ था (जो भागी नहीं), तो अल्लाह ने तुम्हें शोक पर शोक दिया, ताकि तुम्हारे हाथ से कोई चीज़ निकल जाए या तुमपर कोई मुसीबत आए तो तुम शोकाकुल न हो। और जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी भली-भाँति ख़बर रखता है।

सुम्-म अन्ज़-ल अलैकुम् मिम्-बअ्दिल-गम्मि अ-म-नतन् नुआसंय्यग्शा ता-इ-फ़तम् मिन्कुम् व ता-इ-फतुन् कद् अहम्मत्हुम अन्फुसुहम् यजुन्नू-न बिल्लाहि गैरल्-हक्कि ज़न्नल-जाहिलिय्यति , यकूलू-न हल्-लना मिनल्-अमरि मिन् शैइन् , कुल् इन्नल्-अम्-र कुल्लहू लिल्लाहि , युख्फू-न फ़ी अन्फुसिहिम् मा ला युब्दू-न ल-क , यकूलू-न लौ का-न लना मिनल-अमरि शैउम् मा कुतिल्ना हाहुना , कुल लौ कुन्तुम् फी बुयू तिकुम् ल-ब-रज़ल्लज़ी-न कुति-ब अलैहिमुल्क़त्लु इला मज़ाजिअिहिम् व लि-यब्तलियल्लाहु मा फी सुदूरिकुम् व लियु-मह़्हि-स माफ़ी कुलूबिकुम् , वल्लाहु अलीमुम् बिज़ातिस्सुदूर (154)
फिर इस शोक के पश्चात उसने तुमपर एक शान्ति उतारी-एक निद्रा, जो तुममें से कुछ लोगों को घेर रही थी और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें अपने प्राणों की चिन्ता थी। वे अल्लाह के विषय में ऐसा ख़याल कर रहे थे, जो सत्य के सर्वथा प्रतिकूल, अज्ञान (काल) का ख़याल था। वे कहते थे, “इन मामलों में क्या हमारा भी कुछ अधिकार है?” कह दो, “मामले तो सबके सब अल्लाह के (हाथ में) हैं।” वे जो कुछ अपने दिलों में छिपाए रखते हैं, तुमपर ज़ाहिर नहीं करते। कहते हैं, “यदि इस मामले में हमारा भी कुछ अधिकार होता तो हम यहाँ मारे न जाते।” कह दो, “यदि तुम अपने घरों में भी होते, तो भी जिन लोगों का क़त्ल होना तय था, वे निकलकर अपने अन्तिम शयन-स्थलों तक पहुँचकर रहते।” और यह इसलिए भी था कि जो कुछ तुम्हारे सीनों में है, अल्लाह उसे परख ले और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है उसे साफ़ कर दे। और अल्लाह दिलों का हाल भली-भाँति जानता है।

इन्नल्लज़ी-न तवल्लौ मिन्कुम् यौ मल-तक़ल् जम्आनि इन्नमस्तज़ल्लहुमुश्शैतानु बि-बअ्ज़ि मा क-सबू व ल-क़द् अफ़ल्लाहु अन्हुम , इन्नल्ला-ह गफूरून् हलीम (155)*
तुममें से जो लोग दोनों गरोहों की मुठभेड़ के दिन पीठ दिखा गए, उन्हें तो शैतान ही ने उनकी कुछ कमाई (कर्म) के कारण विचलित कर दिया था। और अल्लाह तो उन्हें क्षमा कर चुका है। निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमा करनेवाला, सहनशील है।


Surah Ale Imran रुकूअ- 17

या अय्युहल्लज़ी-न आमनू ला तकूनू कल्लज़ी-न क-फरू व कालू लि-इख़्वानिहिम् इज़ा ज़-रबू फ़िल्अर्ज़ि औ कानू गुज्जल-लौ कानू अिन्दना मा मातू व मा कुतिलू लि-यज्अलल्लाहु जालि-क हस्-रतन् फ़ी कुलूबिहिम् , वल्लाहु युह्यी व युमीतु , वल्लाहु बिमा तअ्मलू-न बसीर (156)
ऐ ईमान लानेवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने इनकार किया और अपने भाइयों के विषय में, जबकि वे सफ़र में गए हों या युद्ध में हों (और उनकी वहाँ मृत्यु हो जाए तो) कहते हैं, “यदि वे हमारे पास होते तो न मरते और न क़त्ल होते।” (ऐसी बातें तो इसलिए होती हैं) ताकि अल्लाह उनको उनके दिलों में घर करनेवाला पछतावा और सन्ताप बना दे। अल्लाह ही जीवन प्रदान करने और मृत्यु देनेवाला है। और तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह अल्लाह की नज़र में है।

व ल इन् कुतिल्तुम् फ़ी सबीलिल्लाहि औ मुत्तुम् ल-मग्फि-रतुम् मिनल्लाहि व रहमतुन् खैरूम् मिम्मा यजूमअून (157)
और यदि तुम अल्लाह के मार्ग में मारे गए या मर गए, तो अल्लाह का क्षमादान और उसकी दयालुता तो उससे कहीं उत्तम है, जिसके बटोरने में वे लगे हुए हैं।

व ल-इम्-मुत्तुम् औ कुतिल्तुम् ल-इलल्लाहि तुह्शरून (158)
हाँ, यदि तुम मर गए या मारे गए, तो प्रत्येक दशा में तुम अल्लाह ही के पास इकट्ठा किए जाओगे।

फ़बिमा रह्मतिम् मिनल्लाहि लिन्-त लहुम् व लौ कुन्-त फज्ज़न् ग़लीज़ल्कल्बि लन्फज्जू मिन् हौलि-क फ़अ्फु अन्हुम् वस्तग्फ़िर लहुम् व शाविरहुम् फ़िल्-अमिर फ़-इज़ा अज़म्-त फ़-तवक्कल् अलल्लाहि , इन्नल्ला-ह युहिब्बुल मु-तवक्किलीन (159)
(तुमने तो अपनी दयालुता से उन्हें क्षमा कर दिया) तो अल्लाह की ओर से ही बड़ी दयालुता है जिसके कारण तुम उनके लिए नर्म रहे हो, यदि कहीं तुम स्वभाव के क्रूर और कठोर हृदय होते तो ये सब तुम्हारे पास से छँट जाते। अतः उन्हें क्षमा कर दो और उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो। और मामलों में उनसे परामर्श कर लिया करो। फिर जब तुम्हारे संकल्प किसी सम्मति पर सुदृढ़ हो जाएँ तो अल्लाह पर भरोसा करो। निस्संदेह अल्लाह को वे लोग प्रिय हैं जो उसपर भरोसा करते हैं।

इंय्यन्सुरकुमुल्लाहु फला गालि-ब लकुम् व इंय्यरजुल्कुम फ़-मन् ज़ल्लज़ी यन्सु रूकुम् मिम्-बअ्दिही , व अलल्लाहि फल य-तवक्कलिल मुअ्मिनून (160)
यदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे, तो कोई तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। और यदि वह तुम्हें छोड़ दे, तो फिर कौन हो जो उसके पश्चात तुम्हारी सहायता कर सके। अतः ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए।

व मा का-न लि-नबिय्यिन अंय्यगुल्-ल मंय्यग्लुल यअ्ति बिमा गल्-ल यौमल कियामति सुम्-म तुवफ्फ़ा कुल्लु नफ्सिम् मा क-सबत् व हुम् ला यु़ज्लमून (161)
यह किसी नबी के लिए सम्भव नहीं कि वह दिल में कीना-कपट रखे, और जो कोई कीना-कपट रखेगा तो वह क़ियामत के दिन अपने द्वेष समेत हाज़िर होगा। और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कमाई का पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएगा और उनपर कुछ भी ज़ुल्म न होगा।

अ-फ़ मनित्त-ब-अ रिज्वानल्लाहि क-मम्बा-अ बि-स-ख़तिम् मिनल्लाहि व मअ्वाहु जहन्नमु , व बिअसल्-मसीर (162)
भला क्या जो व्यक्ति अल्लाह की इच्छा पर चले वह उस जैसा हो सकता है जो अल्लाह के प्रकोप का भागी हो चुका हो और जिसका ठिकाना जहन्नम है? और वह क्या ही बुरा ठिकाना है।

हुम् द-रजातुन् अिन्दल्लाहि , वल्लाहु बसीरूम्-बिमा यअ्मलून (163)
अल्लाह के यहाँ उनके विभिन्न दर्जे हैं और जो कुछ वे कर रहे हैं, अल्लाह की नज़र में है।

अल-क़द् मन्नल्लाहु अलल मुअ्मिनी-न इज् ब-अ-स फ़ीहिम रसूलम्-मिन् अन्फुसिहिम् यत्लू अलैहिम् आयातिही व युज़क्कीहिम् व युअ़ल्लिमुहुमुल् किता-ब वल्-हिक्म-त व इन् कानू मिन् कब्लु लफ़ी ज़लालिम् मुबीन • (164)
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा उपकार किया, जबकि स्वयं उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठाया जो उन्हें उसकी आयतें सुनाता है और उन्हें निखारता है, और उन्हें किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है, अन्यथा इससे पहले वे लोग खुली गुमराही में पड़े हुए थे।

अ-व-लम्मा असाबत्कुम् मुसीबतुन् कद् असब्तुम् मिस्लैहा कुल्तुम् अन्ना हाज़ा , कुल् हु-व मिन् अिन्दि अन्फुसिकुम , इन्नल्ला-ह अला कुल्लि शैइन् क़दीर (165)
यह क्या कि जब तुम्हें एक मुसीबत पहुँची, जिसकी दोगुनी तुमने पहुँचाई, तो तुम कहने लगे कि, “यह कहाँ से आ गई?” कह दो, “यह तो तुम्हारी अपनी ओर से है, अल्लाह को तो हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।”

व मा असाबकुम् यौमल्-तकल जम्आनि फ़बि-इजनिल्लाहि व लि-यअ्-लमल मुअ्मिनीन (166)
और दोनों गरोहों की मुठभेड़ के दिन जो कुछ तुम्हारे सामने आया वह अल्लाह ही की अनुज्ञा से आया और इसलिए कि वह जान ले कि ईमानवाले कौन हैं।

व लि-यअ्-लमल्लज़ी-न नाफ़कू व की-ल लहुम् तआलौ कातिलू फ़ी सबीलिल्लाहि अविद्फअू , कालू लौ नअ्लमु कितालल्-लत्त-बअ्नाकुम , हुम् लिल्कुफ़्रि यौमइज़िन् अकरबु मिन्हुम् लिल्-ईमानि यकूलू-न बिअफ़्वाहिहिम् मा लै-स फ़ी कुलूबिहिम् , वल्लाहु अअ्लमु बिमा यक़्तुमून (167)
और इसलिए कि वह कपटाचारियों को भी जान ले जिनसे कहा गया कि “आओ, अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो या दुश्मनों को हटाओ।” उन्होंने कहा, “यदि हम जानते कि लड़ाई होगी तो हम अवश्य तुम्हारे साथ हो लेते।” उस दिन वे ईमान की अपेक्षा अधर्म के अधिक निकट थे। वे अपने मुँह से वे बातें कहते हैं, जो उनके दिलों में नहीं होती। और जो कुछ वे छिपाते हैं, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है।

अल्लज़ी-न कालू लि-इख्वानिहिम् व क-अदू लौ अताअूना मा कुतिलू , कुल फद्रऊ अन् अन्फुसिकुमुल्मौ-त इन् कुन्तुम् सादिक़ीन (168)
ये वही लोग हैं जो स्वयं तो बैठे रहे और अपने भाइयों के विषय में कहने लगे, “यदि वे हमारी बात मान लेते तो मारे न जाते।” कह दो, “अच्छा, यदि तुम सच्चे हो, तो अब तुम अपने ऊपर से मृत्यु को टाल देना।”

वला तह़्सबन्नल्लज़ी-न कुतिलू फ़ी सबीलिल्लाहि अम्वातन् , बल अह्याउन अिन्-द रब्बिहिम् युरज़कून् (169)
तुम उन लोगों को जो अल्लाह के मार्ग में मारे गए हैं, मुर्दा न समझो, बल्कि वे अपने रब के पास जीवित हैं, रोज़ी पा रहे हैं।

फ़रिही-न बिमा आताहुमुल्लाहु मिन् फ़ज्लिही व यस्तब्शिरू-न बिल्लज़ी-न लम् यल्हकू बिहिम् मिन् ख़ल्फ़िहिम् अल्ला खौफुन् अलैहिम् व ला हुम् यह्ज़नून • (170)
अल्लाह ने अपनी उदार कृपा से जो कुछ उन्हें प्रदान किया है, वे उसपर बहुत प्रसन्न हैं और उन लोगों के लिए भी ख़ुश हो रहे हैं जो उनके पीछे रह गए हैं, अभी उनसे मिले नहीं हैं कि उन्हें भी न कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे।

यस्तब्शिरू-न बिनिअ्मतिम मिनल्लाहि व फ़ज्लिंव-व अन्नल्ला-ह ला युज़ीअु अज्रल मुअ्मिनीन (171)*
वे अल्लाह के अनुग्रह और उसकी उदार कृपा से प्रसन्न हो रहे हैं और इससे कि अल्लाह ईमानवालों का बदला नष्ट नहीं करता।


रुकूअ- 18

अल्लज़ीनस्तजाबू लिल्लाहि वर्रसूलि मिम्-बअ्दि मा असाबहुमुल्करहु , लिल्लज़ी-न अह्सनू मिन्हुम् वत्तकौ अज्रून् अज़ीम (172)
जिन लोगों ने अल्लाह और रसूल की पुकार को स्वीकार किया, इसके पश्चात कि उन्हें आघात पहुँच चुका था। इन सत्कर्मी और (अल्लाह का) डर रखनेवालों के लिए बड़ा प्रतिदान है।

अल्लज़ी-न का-ल लहुमुन्नासु इन्नन्ना-स कद् ज-मअू लकुम् फख्शौहुम् फ़-ज़ादहुम् ईमानंव-व कालू हस्बुनल्लाहु व निअ्मल वकील (173)
ये वही लोग हैं जिनसे लोगों ने कहा, “तुम्हारे विरुद्ध लोग इकट्ठा हो गए हैं, अतः उनसे डरो।” तो इस चीज़ ने उनके ईमान को और बढ़ा दिया। और उन्होंने कहा, “हमारे लिए तो बस अल्लाह काफ़ी है और वही सबसे अच्छा कार्य-साधक है।”

फन्क-लबू बिनिअ्मतिम्-मिनल्लाहि व फज़लिल-लम् यम्सस्हुम् सूउंव्-वत्त-बअू रिज्वानल्लाहि , वल्लाहु जू फ़ज्लिन् अज़ीम (174)
तो वे अल्लाह की ओर से प्राप्त होनेवाली नेमत और उदार कृपा के साथ लौटे। उन्हें कोई तकलीफ़ छू भी नहीं सकी और वे अल्लाह की इच्छा पर चले भी, और अल्लाह बड़ी ही उदार कृपावाला है।

इन्नमा जालिकुमुश्शैतानु युखव्विफु औलिया-अहू फला तख़ाफूहुम् व ख़ाफूनि इन् कुन्तुम् मुअ्मिनीन (175)
वह तो शैतान है जो अपने मित्रों को डराता है। अतः तुम उनसे न डरो, बल्कि मुझी से डरो, यदि तुम ईमानवाले हो।

व ला यह्जुन्कल्लज़ी-न युसारिअू-न फ़िल्कुफिर इन्नहुम् लंय्यजुर्रुल्ला-ह शैअन् , युरीदुल्लाहु अल्ला यज्अ-ल लहुम् ह़ज्ज़न फिल्-आख़िरति व लहुम् अज़ाबुन् अज़ीम (176)
जो लोग अधर्म और इनकार में जल्दी दिखाते हैं, उनके कारण तुम दुखी न हो। वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। अल्लाह चाहता है कि उनके लिए आख़िरत में कोई हिस्सा न रखे, उनके लिए तो बड़ी यातना है।

इन्नल्लज़ीनश्-त-र वूल्-कुफू-र बिल-ईमानि लंय्यजुर्रूल्ला-ह शैअन् व लहुम् अज़ाबुन् अलीम (177)
जो लोग ईमान की क़ीमत पर इनकार और अधर्म के ग्राहक हुए, वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, उनके लिए तो दुखद यातना है।

व ला यह़्सबन्नल्लज़ी-न क-फरू अन्नमा नुम्ली लहुम् खैरूल् लिअन्फुसिहिम् , इन्नमा नुम्ली लहुम् लि-यज्दादू इस्मन् व लहुम् अज़ाबुम् मुहीन (178)
और यह ढील जो हम उन्हें दिए जाते हैं, इसे अधर्मी लोग अपने लिए अच्छा न समझें। यह ढील तो हम उन्हें सिर्फ़ इसलिए दे रहे हैं कि वे गुनाहों में और अधिक बढ़ जाएँ, और उनके लिए तो अत्यन्त अपमानजनक यातना है।

मा कानल्लाहु लि-य-ज़ रल मुअ्मिनी-न अला मा अन्तुम् अलैहि हत्ता यमीज़ल-ख़बी-स मिनत्तय्यिबि , व मा कानल्लाहु लियुत्लि-अकुम् अलल्-गैबि व लाकिन्नल्ला-ह यज्तबी मिर्रूसुलिही मंय्यशा-उ फ-आमिनू बिल्लाहि व रूसुलिही व इन् तुअमिनू व तत्तकू फ़-लकुम् अज्रून् अज़ीम (179)
अल्लाह ईमानवालों को इस दशा में नहीं रहने देगा, जिसमें तुम हो। यह तो उस समय तक की बात है जब तक कि वह अपवित्र को पवित्र से पृथक नहीं कर देता। और अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष की सूचना दे दे। किन्तु अल्लाह इस काम के लिए जिसको चाहता है चुन लेता है, और वे उसके रसूल होते हैं। अतः अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ। और यदि तुम ईमान लाओगे और (अल्लाह का) डर रखोगे तो तुमको बड़ा प्रतिदान मिलेगा।

व ला यह़्सबन्नल्लज़ी-न यब्खलू-न बिमा आताहुमुल्लाहु मिन् फ़ज्लिही हु-व खैरल्लहुम् , बल् हु-व शर्रूल्लहुम् , सयुतव्वकू-न मा बखिलू बिही यौमल्-क़ियामति , व लिल्लाहि मीरासुस्समावाति वलअर्ज़ि , वल्लाहु बिमा तअ्मलू-न ख़बीर (180)*
जो लोग उस चीज़ में कृपणता से काम लेते हैं, जो अल्लाह ने अपनी उदार कृपा से उन्हें प्रदान की है, वे यह न समझें कि यह उनके हित में अच्छा है, बल्कि यह उनके लिए बुरा है। जिस चीज़ में उन्होंने कृपणता से काम लिया होगा, वही आगे क़ियामत के दिन उनके गले का तौक़ बन जाएगा। और ये आकाश और धरती अंत में अल्लाह ही के लिए रह जाएँगे। तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।


Surah Ale Imran रुकूअ- 19

ल-कद् समिअल्लाहु कौलल्लज़ी-न-कालू इन्नल्ला-ह फकीरूंव-व नह़्नु , अग्निया-उ • सनक्तुबु मा कालू व कत्लहुमुल्-अम्बिया-अ बिगैरि हक्किंव-व नकूलु जूकू अज़ाबल हरीक (181)
अल्लाह उन लोगों की बात सुन चुका है जिनका कहना है कि “अल्लाह तो निर्धन है और हम धनवान हैं।” उनकी बात हम लिख लेंगे और नबियों को जो वे नाहक क़त्ल करते रहे हैं उसे भी। और हम कहेंगे, “लो, (अब) जलने की यातना का मज़ा चखो।”

ज़ालि-क बिमा कद्द-मत् ऐदीकुम् व अन्नल्ला-ह लै-स बिज़ल्लामिल लिल्-अबीद (182)
यह उसका बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा। अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी ज़ुल्म नहीं करता।

अल्लज़ी-न कालू इन्नल्ला-ह अहि-द इलैना अल्ला नुअ्मि-न लि-रसूलिन् हत्ता यअ्ति-यना बिकुर्बानिन् तअ्कुलुहुन्नारू , कुल कद् जा-अकुम् रूसुलुम् मिन् कल्ली बिल्-बय्यिनाति व बिल्लजी कुल्तुम् फलि-म कतल्तुमूहुम् इन् कुन्तुम् सादिक़ीन (183)
ये वही लोग हैं जिनका कहना है कि “अल्लाह ने हमें ताकीद की है कि हम किसी रसूल पर ईमान न लाएँ, जब तक कि वह हमारे सामने ऐसी क़ुरबानी न पेश करे जिसे आग खा जाए।” कहो, “तुम्हारे पास मुझसे पहले कितने ही रसूल खुली निशानियाँ लेकर आ चुके हैं, और वे वह चीज़ भी लाए थे जिसके लिए तुम कह रहे हो। फिर यदि तुम सच्चे हो तो तुमने उन्हें क़त्ल क्यों किया?”

फ-इन् कज्जबू-क फ़-क़द् कुज्जि-ब रूसुलुम् मिन् कब्लि-क जाऊ बिल्बय्यिनाति वज़्जुबुरि वल-किताबिल मुनीर (184)
फिर यदि वे तुम्हें झुठलाते ही रहें, तो तुमसे पहले भी कितने ही रसूल झुठलाए जा चुके हैं, जो खुली निशानियाँ, ‘ज़बूरें’ और प्रकाशमान किताब लेकर आए थे।

कुल्लु नफ्सिन् ज़ा-इ-कतुल्मौति , व इन्नमा तुवफ्फ़ौ-न उजू-रकुम् यौमल-कियामति , फ़-मन् जुहिज़-ह अनिन्नारि व उदखिलल्-जन्न-त फ़-कद् फ़ा-ज़ , व मल्हयातुद्-दुन्या इल्ला मताअुल गु़रूर (185)
प्रत्येक जीव मृत्यु का मज़ा चखनेवाला है, और तुम्हें तो क़ियामत के दिन पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएगा। अतः जिसे आग (जहन्नम) से हटाकर जन्नत में दाख़िल कर दिया गया, वह सफल रहा। रहा सांसारिक जीवन, तो वह माया-सामग्री के सिवा कुछ भी नहीं।

लतुब्लवुन्-न फ़ी अम्वालिकुम् व अन्फुसिकुम् , व ल-तस्मअुन्-न मिनल्लज़ी-न ऊतुल-किता-ब मिन् कब्लिकुम् व मिनल्लज़ी-न अश्रकू अज़न् कसीरन् , व इन् तस्बिरू व तत्तकू फ़-इन्-न ज़ालि-क मिन् अज्मिल उमूर (186)
तुम्हारे माल और तुम्हारे प्राण में तुम्हारी परीक्षा होकर रहेगी और तुम्हें उन लोगों से जिन्हें तुमसे पहले किताब प्रदान की गई थी और उन लोगों से जिन्होंने ‘शिर्क’ किया, बहुत-सी कष्टप्रद बातें सुननी पड़ेंगी। परन्तु यदि तुम जमे रहे और (अल्लाह का) डर रखा, तो यह उन कर्मों में से है जो आवश्यक ठहरा दिया गया है।

व इज् अ-ख़ज़ल्लाहु मीसाकल्लज़ी-न ऊतुल्-किता-ब लतु-बय्यिनुन्नहू लिन्नासि व ला तक्तुमूनहू फ़-न-बजूहु वरा-अ जुहूरिहिम् वश्तरौ बिही स-मनन् क़लीलन् , फ़-बिअ्-स मा यश्तरून (187)
याद करो जब अल्लाह ने उन लोगों से, जिन्हें किताब प्रदान की गई थी, वचन लिया था कि “उसे लोगों के सामने भली-भाँति स्पष्ट करोगे, उसे छिपाओगे नहीं।” किन्तु उन्होंने उसे पीठ पीछे डाल दिया और तुच्छ मूल्य पर उसका सौदा किया। कितना बुरा सौदा है जो ये कर रहे हैं।

ला तह़् सबन्ल्लज़ी-न यफ्रहू-न बिमा अतव-व युहिब्बू-न अंय्युह़्मदू बिमा लम् यफ्अलू फ़ला तह़्सबन्नहुम् बि-मफ़ाज़तिम् मिनल-अज़ाबि व लहुम् अज़ाबुन अलीम (188)
तुम उन्हें कदापि यह न समझना, जो अपने किए पर ख़ुश हो रहे हैं और जो काम उन्होंने नहीं किए, चाहते हैं कि उनपर भी उनकी प्रशंसा की जाए-तो तुम उन्हें यह न समझना कि वे यातना से बच जाएँगे, उनके लिए तो दुखद यातना है।

व लिल्लाहि मुल्कुस्समावाति वल्अर्जि , वल्लाहु अला कुल्लि शैइन् क़दीर (189)*
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है, और अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।


Surah Ale Imran रुकूअ- 20

इन्-न फी ख़ल्किस्समावाति वल्अर्जि वख्तिलाफिल्लैलि वन्नहारि ल-आयातिल्-लिउलिल अल्बाब (190)
निस्सन्देह आकाशों और धरती की रचना में और रात और दिन के आगे-पीछे बारी-बारी आने में उन बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ हैं

अल्लज़ी-न यज्कुरूनल्ला-ह कियामंव्-व कुअूदंव्-व अला जुनूबिहिम् व य-तफ़क्करू-न फ़ी ख़ल्किस्समावाति वल्अर्ज़ि रब्बना मा ख़लक्-त हाज़ा बातिलन् सुब्हान-क फ़क़िना अज़ाबन्नार (191)
जो खड़े, बैठे और अपने पहलुओं पर लेटे अल्लाह को याद करते हैं और आकाशों और धरती की रचना में सोच-विचार करते हैं। (वे पुकार उठते हैं,) “हमारे रब! तूने यह सब व्यर्थ नहीं बनाया है। महान है तू, अतः तू हमें आग की यातना से बचा ले।

रब्बना इन्न-क मन् तुदखिलिन् ना-र फ़-कद अख़्जैतहू व मा लिज्जालिमी-न मिन् अन्सार (192)
हमारे रब, तूने जिसे आग में डाला, उसे रुसवा कर दिया। और ऐसे ज़ालिमों का कोई सहायक न होगा।

रब्बना इन्नना समिअ् ना मुनादियंय्युनादी लिल्ईमानि अन् आमिनू बि-रब्बिकुम् फ़-आमन्ना रब्बना फ़ग्फिर लना जु़नूबना व कफ्फिर अन्ना सय्यिआतिना व तवफ्फ़ना मअल् अब्रार (193)
“हमारे रब! हमने एक पुकारनेवाले को ईमान की ओर बुलाते सुना कि अपने रब पर ईमान लाओ। तो हम ईमान ले आए। हमारे रब! तो अब तू हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे और हमारी बुराइयों को हमसे दूर कर दे और हमें नेक और वफ़़ादार लोगों के साथ (दुनिया से) उठा।

रब्बना व आतिना मा व-अत्तना अला रूसुलि-क व ला तुख़्जिना यौमल-कियामति , इन्न-क ला तुलिफुल मीआ़द (194)
“हमारे रब! जिस चीज़ का वादा तूने अपने रसूलों के द्वारा किया वह हमें प्रदान कर और क़ियामत के दिन हमें रुसवा न करना। निस्संदेह तू अपने वादे के विरुद्ध जानेवाला नहीं है।”

फ़स्तजा-ब लहुम् रब्बुहुम् अन्नी ला उज़ीअु अ-म-ल आमिलिम् मिन्कुम् मिन् ज़-करिन् औ उन्सा बअ्जुकुम् मिम्-बअ्जिन फ़ल्लज़ी-न हाजरू व उखिरजू मिन् दियारिहिम् व ऊजू फी सबीली व कातलू व कुतिलू ल-उकफ्फिरन्-न अन्हुम् सय्यिआतिहिम् व ल-उदखिलन्नहुम् जन्नातिन् तज्री मिन् तह़्तिहल अन्हारू सवाबम् मिन् अिन्दिल्लाहि , वल्लाहु अिन्दहू हुस्नुस्सवाब (195)
तो उनके रब ने उनकी पुकार सुन ली कि “मैं तुममें से किसी कर्म करनेवाले के कर्म को अकारथ नहीं करूँगा, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। तुम सब आपस में एक-दूसरे से हो। अतः जिन लोगों ने (अल्लाह के मार्ग में) घरबार छोड़ा और अपने घरों से निकाले गए और मेरे मार्ग में सताए गए, और लड़े और मारे गए, मैं उनसे उनकी बुराइयाँ दूर कर दूँगा और उन्हें ऐसे बाग़ों में प्रवेश कराऊँगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी।” यह अल्लाह के पास से उनका बदला होगा और सबसे अच्छा बदला अल्लाह ही के पास है।

ला यगुर्रन्न-क त-कल्लुबुल्लज़ी-न क-फरू फ़िल्बिलाद (196)
बस्तियों में इनकार करने वालों की चलत-फिरत तुम्हें किसी धोखे में न डाले।

मताअुन् कलीलुन् , सुम्-म मअ्वाहुम् जहन्न-मु , व बिअ्सल मिहाद (197)
यह तो थोड़ी सुख-सामग्री है फिर तो उनका ठिकाना जहन्नम है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है।

लाकिनिल्लज़ीनत्तकौ रब्बहुम् लहुम् जन्नातुन् तज्री मिन् तह़्तिहल अन्हारू ख़ालिदी-न फ़ीहा नुजुलम् मिन् अिन्दिल्लाहि , व मा अिन्दल्लाहि खैरूल्-लिल अब्रार • (198)
किन्तु जो लोग अपने रब से डरते रहे उनके लिए ऐसे बाग़ होंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। वे उसमें सदैव रहेंगे। यह अल्लाह की ओर से पहला आतिथ्य-सत्कार होगा और जो कुछ अल्लाह के पास है वह नेक और वफ़ादार लोगों के लिए सबसे अच्छा है।

व इन्-न मिन् अह़्लिल्-किताबि ल-मंय्युअ्मिनु बिल्लाहि व मा उन्ज़ि-ल इलैकुम् व मा उन्ज़ि-ल इलैहिम् ख़ाशिअी-न लिल्लाहि ला यश्तरू-न बिआयातिल्लाहि स-मनन क़लीलन् , उलाइ-क लहुम् अज्रूहुम् अिन्-द रब्बिहिम् , इन्नल्ला-ह सरीअुल हिसाब (199)
और किताबवालों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो इस हाल में कि उनके दिल अल्लाह के आगे झुके हुए होते हैं, अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उस चीज़ पर भी जो तुम्हारी ओर उतारी गई है, और उस चीज़ पर भी जो स्वयं उनकी ओर उतरी। वे अल्लाह की आयतों का ‘तुच्छ मूल्य पर सौदा’ नहीं करते, उनके लिए उनके रब के पास उनका प्रतिदान है। अल्लाह हिसाब भी जल्द ही कर देगा।

या अय्युहल्लज़ी-न आमनुस्बिरू व साबिरू व राबितू , वत्तकुल्ला-ह लअल्लकुम् तुफ्लिहून (200)*
ऐ ईमान लानेवालो! धैर्य से काम लो और (मुक़ाबले में) बढ़-चढ़कर धैर्य दिखाओ और जुटे और डटे रहो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम सफल हो सको।


Surah Ale Imran Pdf Download

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